Saturday, January 12, 2019

अर्थ अनर्थ

भटक गया है ऐ राही तू, जाने क्या सब ढूँढ रहा है,
करने क्या आया था रहबर, व्यर्थ में अर्थ अब ढूँढ रहा है,

यह संसार मृत्युशैया है, तेरा सब ठग जायेगा,
क्या लेके तू आया ही था, क्या ही लेके जायेगा,

रेल यात्रा सा है जीवन, कई पड़ाव लाता हैं,
हर पड़ाव पर कोई यात्री, आपनी मंजिल पता हैं,
कोई किसी का यार नहीं, सब रह-गुज़र के नाते हैं,
तेरा मकसद कुछ और है, ये तो बस भटकाते हैं,

बचपन सच्चा दोस्त है, मकसद साफ़ दिखता है,
वक़्त का पहिया फिर हमसे, यह बचपन ही ले जाता है,
फिर जीवन मंच के प्रपंच में, जीवन का मकसद खो जाता है,
व्यर्थ की बातों में ही, जीवन अनर्थ हो जाता है|

P.S.- Written in the fond memory of my grandfather, inspirational writer, poet, Late Shri Rampujan Malik. Yesterday was his death anniversary. I don’t usually write in hindi because I feel belittled by his artworks, but today I attempted it as a dedication to him. Miss you Baba!!