भटक गया है ऐ राही तू, जाने
क्या सब ढूँढ रहा है,
करने क्या आया था रहबर,
व्यर्थ में अर्थ अब ढूँढ रहा है,
यह संसार मृत्युशैया है, तेरा सब ठग जायेगा,
क्या लेके तू आया ही था, क्या ही लेके जायेगा,
रेल यात्रा सा है जीवन, कई पड़ाव लाता हैं,
हर पड़ाव पर कोई यात्री, आपनी मंजिल पता हैं,
कोई किसी का यार नहीं, सब रह-गुज़र के नाते हैं,
तेरा मकसद कुछ और है, ये तो बस भटकाते हैं,
बचपन सच्चा दोस्त है, मकसद साफ़ दिखता है,
वक़्त का पहिया फिर हमसे, यह
बचपन ही ले जाता है,
फिर जीवन मंच के प्रपंच में,
जीवन का मकसद खो जाता है,
व्यर्थ की बातों में ही, जीवन
अनर्थ हो जाता है|
3 comments:
Very thoughtful lines..
Very nice attempt sirji
Thanks
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